प्यारी माँ मुझे डर लगता है तुम्हे देखकर

मेरे सपने काफ़ी ज़्यादा है और वक़्त मेरे पास है कम
हज़ारों खुशियों पर हावी क्यों पड़ जाते है कुछ गम
क्यों मैं जला रही हूँ अपना आज सोचकर अपना कल
क्यों नहीं ख़ुशी से जी रही मैं इस ज़िन्दगी का हर पल

जब भी तुम्हे देखूँ एक डर मुझे घेर लेता है माँ
ये डर मेरे मन में तेरी डाट या मार का नहीं
ये डर तो है तेरी धुँधली होती पहचान का
तेरे कम होते मान सम्मान का और
तेरी फीकी पड़ती मुस्कान का।

तेरे अस्तित्व में अपना भविष्य देखकर डर लगता है माँ
क्या कोई वजूद न रह जाएगा मेरी खुद की पहचान का
क्या मैं भी किसी की बीवी किसी की माँ बन रह जाऊँगी
क्या हर पड़ाव पर ज़िम्मेदारियों तले खुद को दबा पाऊँगी
माँ तू ही बता ऐसे कैसे मैं उड़ पाऊँगी

मैंने तेरी खूबियों तेरी कलाकृतियों को देखा है
तुझमें माँ के साथ एक कलाकार मैंने देखा है
मेरी ज़िम्मेदारी उठाते उठाते तू खुद को खो बैठी है
मेरी पहचान बनाते बनाते तेरी पहचान तुझसे रूठी है

माँ सुन अब तो अपनी पहचान पाने के लिए कुछ कर
दिखा दे इस जहां को फ़िरसे साहसी सुमित्रा बनकर
मुझे हिम्मत चाहिए ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की
माँ एक बार देदे मुझे सलाह ज़िन्दगी जीने की।

5 thoughts on “प्यारी माँ मुझे डर लगता है तुम्हे देखकर

  1. बहुत कम लोग होते है जो माँ के जज्बात समझते हैं
    इतना ही काफी है तुमने इसको समझा।
    माँ के लिए इतना ही काफी है।
    तुम ही अपनी माँ की मुस्कान हो
    तुम ही माँ का सम्मान हो।

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  2. अत्यंत खूबसूरत कविता!  बेटी की व्यथा और आकांक्षा को बखूबी दर्शाया है ! साधुवाद आपको | 
    मेरी भी यह एक दो साल पुरानी एक कविता में ऐसा ही कुछ कहने का प्रयास किया था , मेरे किसी अंतरंग पर बीत रही व्यथा कथा थी : 
    माँ आज कल देख तुझेमुझे अति भय होता है 
    मेरे मन को हज़ारों प्रश्नों ने  घेरा होता है 
    नाना ने कह, है तू पराई, विदा तुझे करदी  
    दादी ने कह पराई जाई,उचित जगह नहीं दी 

    मेरे अंदर पलते संशय का हल माँ कर दो 
    कैसे विवाह है एक पवित्र बंधन, माँ समझा दो !
    माँ क्या तेरे आज सा ही मेरा भी कल होगा 
    क्या इसी तरह रोने का ही  हर पल होगा 

    क्या होगा सिर्फ आँचल में दूध और आँखों में पानी 
    क्या मेरी भी कटेगी रसोई में ही घिस घिस जवानी 
    क्या मैं भी खो दूंगी पहचान कुछ बनने से पहले 
    क्या सारे सुख हासिल होते केवल शादी से पहले 

    क्या मुझे भी देनी होगी डोर किसी अन्य के हाथों में 
    क्या मुझको भी सुनने होंगे व्यंग ही बातों बातों में 
    क्यों मुझे सिखाती नृत्य जब रहना बन कठपुतली है 
    हाथ पैर गर्दन सब हिलने और किसी की मरजी है 

    जैसे तूने खोया है क्या मुझे भी खोना होगा अस्तित्व 
    वो तो मनुज सम नहीं रहें पर हमें निभाना नारीत्व ?
    मैं नहीं कहती तुम कैकेयी बन अन्याय करो 
    सुमित्रा सम बिन बोले भी क्यों इतना तुम सहो 

    अपने लिए नहीं तो केवल मुझे सिखाने को 
    कुछ तो करो माँ अपनी पहचान बनाने को 
    मैं नहीं चाहती और किसी के नाम से केवल जानी जाऊँ 
    उसकी बहु उसकी माँ उसकी पत्नी ही केवल कहलाऊं 
    तेरा आशीष मांगती माँ , अभी मुझे  छूने हैं ऊँचे शिखर 
    अपने आचरण से हिम्मत दे , मुझे जीवन बनाना है प्रखर | 

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